A Baptist Catechism (हिन्दी)

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Description

विश्वास प्रश्नोत्तर क्या होता है?
1 कुरिन्थियों 14:19 में पौलुस कहता है, “परन्तु कलीसिया में अन्य भाषा में दस हज़ार बातें कहने से यह मुझे और भी अच्छा जान पड़ता है कि दूसरों को सिखाने के लिए बुद्धि से पाँच ही बातें कहूँ।” गलातियों 6:6 में वह कहता है, “जो वचन की शिक्षा पाता है, वह सब अच्छी वस्तुओं में सिखाने वाले को भागी करे।” प्रेरितों के काम 18:25 कहता है कि अपुल्लोस ने “प्रभु के मार्ग की शिक्षा पाई थी।”
इनमें से प्रत्येक पद में “सिखाने” या “शिक्षा” के लिए प्रयुक्त हुआ यूनानी शब्द katecheo है। इसी यूनानी शब्द से हमें अंग्रेजी का शब्द “catechize” मिलता है। सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि बाइबल की शिक्षा सुव्यवस्थित रीति से दी जाए। ऐसा प्रायः प्रश्नों और उत्तरों के माध्यम से किया जाता है, जिनके साथ बाइबल के पद और कुछ टिप्पणियाँ दी जाती हैं।
इस विश्वास प्रश्नोत्तर का इतिहास क्या है?
यह धार्मिक प्रश्नोत्तरी “दि बैपटिस्ट कैटेकिज़्म अथवा बैपटिस्ट धार्मिक प्रश्नोत्तरी” का थोड़ा संशोधित रूप है, जिसे सर्वप्रथम बैपटिस्ट मिशन के द्वारा 1689 में ग्रेट ब्रिटेन में तैयार किया गया था। 1742 में इसे फिलाडेलफिया बैपटिस्ट एसोसिएशन द्वारा अपनाया गया। इसकी पद्धति सुविख्यात रिफॉर्म्ड वेस्टमिन्स्टर धार्मिक प्रश्नोत्तरी पर आधारित है। आरम्भिक प्रश्नों में दी गई कुछ टिप्पणियाँ अभिभावकों की सहायता के लिए हैं, ताकि वे इन्हें अपने बच्चों को सरलता से सिखा सकें।
क्या सैद्धान्तिक शिक्षा की कोई बाइबल आधारित पद्धति है?
बाइबल के विभिन्न पद हमें ऐसी एक पद्धति के बारे में सिखाते हैं। उदाहरण के लिए, रोमियों 6:17 में पौलुस आभार व्यक्त करते हुए लिखता है कि “तुम जो पाप के दास थे, अब मन से उस उपदेश के मानने वाले हो गए, जिसके साँचे में ढाले गए थे।”
2 तीमुथियुस 1:13 कहता है, “जो खरी बातें तू ने मुझ से सुनी हैं, उनको उस विश्वास और प्रेम के साथ, जो मसीह यीशु में है, अपना आदर्श बनाकर रख।”
प्रेरितों के काम 2:42 कहता है, “वे प्रेरितों की शिक्षा में … लगे रहे।”
2 थिस्सलुनीकियों 2:15 कहता है, “इसलिये हे भाइयों, स्थिर रहो और जो बातें तुमने चाहे वचन या पत्री के द्वारा हम से सीखी हैं, उन्हें थामे रहो।”
और प्रेरितों के काम 20:27 कहता है, “मैं परमेश्वर के सारे अभिप्राय को तुम्हें पूरी रीति से बताने से न झिझका।”
अतः ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भिक कलीसिया में कुछ आधिकारिक निर्देश मौजूद थे और उन्हें सिखाए जाने की एक पद्धति भी थी।
यह महत्वपूर्ण क्यों है?
  1. हमसे माँग की गई है कि हम “विश्वास की नींव पर दृढ़ बने रहें” (कुलु. 1:23)।
  2. हमसे आग्रह किया गया है कि “हम सब के सब विश्वास और परमेश्वर के पुत्र की पहचान में एक हो जाएँ … ताकि हम आगे को बालक न रहें जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से, उनके भ्रम की युक्तियों के द्वारा उपदेश के हर एक झोंके से उछाले और इधर-उधर घुमाए जाते हों” (इफि. 4:13-14)।
  3. बहुत से भरमाने वाले लोग मौजूद हैं (1 यूहन्ना 2:26)।
  4. कुछ सैद्धान्तिक शिक्षाएँ समझने में कठिन हैं और “अनपढ़ और चंचल लोग उनके अर्थों को खींच-तानकर अपने ही नाश का कारण बनाते हैं” (2 पतरस 3:16)।
  5. ऐसे अगुवे तैयार किए जाने की आवश्यकता है, जो “खरी शिक्षा से उपदेश दे सकें और विरोधियों का मुँह भी बन्द कर सकें” (तीतुस 1:9)।
हम कैसे आरम्भ करें?
इन्हें अपनी पारिवारिक दिनचर्या का हिस्सा बना लें या फिर अपने स्वयं के लिए इनका उपयोग करें। आपके साथ सहभागिता करके मैं बहुत उत्साहित हूँ, ताकि हम परमेश्वर पर आशा रखने वाली एक “स्थिर और मजबूत” पीढ़ी को तैयार कर सकें।
आपके साथ मिलकर सीखते और सिखाते हुए,
पास्टर जॉन

Additional information

Weight 100 g
Dimensions 14.2 × 21.5 cm
Format

Language

Pages

70

Publisher

Alethia Publications 2026

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